महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खाना और जंगलों में भटकना स्वीकार किया, लेकिन कभी गुलामी स्वीकार नहीं की।
जन्म: उनका जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग (बादल महल) में हुआ था।
माता-पिता: उनके पिता मेवाड़ के शासक महाराणा उदय सिंह द्वितीय और माता रानी जयवंता बाई थीं।
बचपन और 'कीका': प्रताप का बचपन भीलों और आदिवासियों के बीच बीता, जो उन्हें प्यार से 'कीका' कहते थे।
राज्याभिषेक: उदय सिंह की मृत्यु के बाद, दरबारी मंत्रियों के सहयोग से 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में उनका राज्याभिषेक हुआ।
महाराणा प्रताप और अकबर का संघर्ष केवल दो राजाओं की लड़ाई नहीं, बल्कि "विस्तारवाद बनाम स्वाभिमान" की जंग थी। जब लगभग पूरा राजपूताना अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुका था, तब प्रताप अकेले अरावली की पहाड़ियों में अडिग खड़े थे।
अकबर जानता था कि मेवाड़ को जीते बिना उसका राजपूताना और गुजरात का मार्ग सुरक्षित नहीं है। उसने प्रताप को समझाने के लिए 1572 से 1576 के बीच चार शिष्टमंडल भेजे: 1. जलाल खान कोरची, 2. मान सिंह, 3. भगवान दास, 4. टोडरमल प्रताप ने सबका स्वागत किया, लेकिन स्पष्ट कह दिया— "मेवाड़ की स्वाधीनता पर कोई समझौता नहीं होगा।"
हल्दीघाटी का युद्ध और चेतक की वीरता (1576)
जब कूटनीति विफल रही, तो अकबर ने मान सिंह के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में भीषण युद्ध हुआ। यह इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध था। इसमें प्रताप की छोटी सेना ने मान सिंह के नेतृत्व वाली विशाल मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया। इसी युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर उनकी रक्षा की थी।
अद्वितीय साहस: प्रताप ने अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर मान सिंह के हाथी पर प्रहार किया।
चेतक का बलिदान: युद्ध में घायल होने के बाद, चेतक ने 26 फीट ऊंचे नाले को लांघकर प्रताप की जान बचाई और स्वयं प्राण त्याग दिए। आज भी हल्दीघाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है।
हल्दीघाटी के बाद प्रताप का महल छिन गया और उन्हें अपने परिवार के साथ अरावली के जंगलों में शरण लेनी पड़ी। इस कठिन समय को उनका 'वनवास' काल कहा जाता है:
कठिन जीवन: महलों में रहने वाले प्रताप अब जमीन पर सोते थे और कंद-मूल फल खाकर गुजारा करते थे।
घास की रोटी: एक प्रसिद्ध लोककथा (पीथल और पाथल) के अनुसार, एक बार प्रताप के बच्चों के हिस्से की घास की रोटी एक जंगली बिलाव छीन ले गया। बच्चों की भूख देखकर प्रताप विचलित हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
भीलों का साथ: इस दौरान स्थानीय भील जनजाति प्रताप की सबसे बड़ी ताकत बनी। उन्होंने छापामार युद्ध (Guerilla Warfare) की कला सीखी और मुगलों की रसद (Supply) काट दी।
जब प्रताप के पास सेना के लिए धन की कमी हो गई, तब मेवाड़ के दानवीर भामाशाह ने अपनी पूरी संपत्ति (लगभग 25 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियाँ) प्रताप के चरणों में रख दी। इससे प्रताप को अपनी सेना पुनर्गठित करने में बड़ी मदद मिली।
अकबर ने खुद तीन बार (1577, 1578 और 1579) मेवाड़ पर आक्रमण किया, लेकिन वह कभी प्रताप को पकड़ नहीं पाया।
दिवेर का युद्ध (1582): इस युद्ध में प्रताप ने मुगलों को निर्णायक रूप से हराया। उन्होंने अकबर द्वारा नियुक्त सूबेदारों को खदेड़ दिया।
अंतिम समय: जीवन के अंतिम वर्षों में प्रताप ने चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर लगभग पूरा मेवाड़ वापस जीत लिया था। उन्होंने अपनी नई राजधानी चावंड बनाई।
19 जनवरी 1597 को जब प्रताप की मृत्यु हुई, तो अकबर लाहौर में था। इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूँनी के अनुसार, जब अकबर को यह खबर मिली, तो वह दुखी हुआ। अकबर ने कहा था— "ऐ प्रताप! तूने अपने धर्म और स्वाभिमान को कभी नहीं बेचा, तू ही इस दुनिया का असली विजेता है।"
प्रताप का वनवास और संघर्ष यह सिखाता है कि साधन कम होने पर भी यदि संकल्प दृढ़ हो, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी झुकाया जा सकता है।
दिवेर का युद्ध (1582): इस युद्ध को कर्नल जेम्स टॉड ने 'मेवाड़ का मैराथन' कहा है। इसमें प्रताप ने मुगलों की 36 चौकियों को नष्ट कर दिया और अधिकांश मेवाड़ को मुक्त करा लिया।
छापामार युद्ध: हल्दीघाटी के बाद, प्रताप ने अरावली की पहाड़ियों से मुगलों के खिलाफ छापामार (Guerilla warfare) युद्ध जारी रखा।
लोककथाओं और कुछ स्रोतों के अनुसार महाराणा प्रताप की शारीरिक क्षमता असाधारण थी, हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुछ भिन्नताएं मिलती हैं:
कद और वजन: कई स्रोतों में उनकी लंबाई 7 फीट 5 इंच और वजन 110 किलो बताया गया है।
शस्त्र: जनश्रुति है कि उनका भाला 81 किलो और कवच 72 किलो का था।
मृत्यु: 19 जनवरी 1597 को 56 वर्ष की आयु में चावंड में एक शिकार दुर्घटना के दौरान लगी चोटों के कारण उनका निधन हुआ।
अकबर की प्रतिक्रिया: कहा जाता है कि प्रताप की वीरता और अडिगता को देखकर उनकी मृत्यु पर अकबर की आँखें भी नम हो गई थीं।
उत्तराधिकारी: उनके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह प्रथम मेवाड़ के शासक बने।
महाराणा प्रताप का जीवन आज भी करोड़ों लोगों को अपनी मातृभूमि की रक्षा और स्वाभिमान के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा देता है।