पुष्यमित्र शुंग मौर्य साम्राज्य के विध्वंसक और वैदिक सनातन धर्म के पुनरुद्धारक की महागाथा।
प्राचीन भारतीय इतिहास में जब भी सबसे शक्तिशाली, विवादास्पद और युगांतरकारी सेनापतियों या सम्राटों का नाम लिया जाता है, तो पुष्यमित्र शुंग (Pushyamitra Shunga) का नाम सबसे पहली पंक्ति में आता है। उन्होंने ही 185 ईसा पूर्व में इतिहास के सबसे महान साम्राज्यों में से एक—मौर्य साम्राज्य—का अंत किया और शुंग राजवंश (Shunga Dynasty) की नींव रखी।
पुष्यमित्र शुंग का काल (लगभग 185 ईसा पूर्व से 149 ईसा पूर्व) भारतीय इतिहास का एक ऐसा संक्रमण काल है, जहां एक ओर पश्चिमोत्तर सीमा से विदेशी यूनानी (यवन) आक्रांताओं के भयंकर हमले हो रहे थे, तो दूसरी ओर देश के भीतर धार्मिक और सांस्कृतिक उथल-पुथल मची हुई थी। सम्राट अशोक की अहिंसावादी नीतियों के कारण सैन्य शक्ति कमजोर हो चुकी थी। ऐसे समय में, पुष्यमित्र ने एक रक्षक के रूप में तलवार उठाई और न केवल विदेशी आक्रमणकारियों को खदेड़ा, बल्कि भारत में वैदिक धर्म (ब्राह्मणवाद) की पुनर्स्थापना भी की।
नीचे पुष्यमित्र शुंग के उदय, मौर्य साम्राज्य के पतन, उनके महान युद्धों, धार्मिक नीतियों और उनके विस्तृत इतिहास का अत्यंत गहराई से वर्णन प्रस्तुत है:
सम्राट अशोक महान की मृत्यु (232 ईसा पूर्व) के बाद, मौर्य साम्राज्य की नींव हिलने लगी थी। अशोक के उत्तराधिकारी (जैसे दशरथ, संप्रति, शालिशुक) अत्यंत कमजोर और विलासी थे। अशोक ने 'भेरीघोष' (युद्ध) के स्थान पर 'धम्मघोष' (शांति) की नीति अपनाई थी, जिसके कारण मौर्य सेना का मनोबल और युद्ध कौशल दशकों की शांति में जंग खा चुका था।
पुष्यमित्र की उत्पत्ति और पद:
पुष्यमित्र शुंग एक कट्टर ब्राह्मण थे। बाणभट्ट द्वारा रचित 'हर्षचरित' और पाणिनि के व्याकरण ग्रंथों के अनुसार, शुंग 'भारद्वाज गोत्र' के ब्राह्मण थे। उनकी सैन्य प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए, अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ (Brihadratha) ने उन्हें अपनी सेना का सर्वोच्च सेनापति (Commander-in-Chief) नियुक्त किया था।
असंतोष का कारण:
पुष्यमित्र और मौर्य सेना के भीतर बृहद्रथ के प्रति गहरा असंतोष था। भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं (वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान) पर बैक्ट्रियन ग्रीक (यवनों) के आक्रमण शुरू हो गए थे। यवन सेनाएं भारत के भीतर तक घुसपैठ कर रही थीं, लेकिन दुर्बल राजा बृहद्रथ केवल अहिंसा और बौद्ध धर्म के उपदेशों में लीन था। सेना को एक ऐसे शक्तिशाली नेता की आवश्यकता थी जो देश की रक्षा कर सके।
भारतीय इतिहास का पहला स्पष्ट और दर्ज सैन्य तख्तापलट (Military Coup) पुष्यमित्र शुंग द्वारा ही किया गया था। यह घटना अत्यंत नाटकीय थी।
सैन्य निरीक्षण की वह सुबह:
बाणभट्ट के 'हर्षचरित' में इस घटना का स्पष्ट वर्णन मिलता है। 185 ईसा पूर्व में, सेनापति पुष्यमित्र ने सम्राट बृहद्रथ को सेना का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया। पाटलिपुत्र के बाहर एक विशाल मैदान में मौर्य सेना अपने हथियारों और हाथियों के साथ सजी हुई थी।
हत्या और सत्ता परिवर्तन:
जब राजा बृहद्रथ सेना का मुआयना कर रहा था, उसी समय पूरी सेना के सामने पुष्यमित्र ने अपनी तलवार निकाली और सम्राट बृहद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया।
(हर्षचरित की पंक्ति: "प्रज्ञादुर्बलं च बलदर्शनव्यपदेशदर्शिंताशेषसैन्यः सेनानीः पुष्यमित्रो दायादं बृहद्रथं पिपेष।" अर्थात् सेनापति पुष्यमित्र ने सेना का प्रदर्शन करते हुए दुर्बल बुद्धि वाले राजा बृहद्रथ को मार डाला।)
आश्चर्य की बात यह थी कि राजा की हत्या के बाद सेना या प्रजा में कोई विद्रोह नहीं हुआ। पूरी सेना ने पुष्यमित्र की जय-जयकार की और उन्हें अपना शासक मान लिया। यह इस बात का प्रमाण है कि राजा बृहद्रथ जनता और सेना दोनों का विश्वास खो चुका था। इस प्रकार 137 वर्षों तक शासन करने वाले मौर्य वंश का अंत हुआ और शुंग वंश की स्थापना हुई।
'सेनानी' की उपाधि:
राजा बनने के बावजूद पुष्यमित्र ने कभी 'महाराजाधिराज' या 'सम्राट' जैसी शाही उपाधियां धारण नहीं कीं। वे जीवन भर खुद को 'सेनानी' (सेनापति) ही कहलवाते रहे। कालिदास के नाटक 'मालविकाग्निमित्रम्' में भी उन्हें 'सेनापति पुष्यमित्र' ही कहा गया है।
सत्ता संभालते ही पुष्यमित्र को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा—देश के भीतर उठने वाले विद्रोह और सीमाओं पर विदेशी यवन आक्रमण।
मौर्य साम्राज्य के पतन का लाभ उठाकर विदर्भ (वर्तमान महाराष्ट्र का हिस्सा) के प्रांतीय गवर्नर यज्ञसेन (Yajnasena) ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। यज्ञसेन पूर्व मौर्य मंत्री का रिश्तेदार था और पुष्यमित्र का स्वाभाविक शत्रु था।
पुष्यमित्र के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत को यवनों (Indo-Greeks) के आक्रमण से बचाना था। महर्षि पतंजलि (जो पुष्यमित्र के समकालीन थे) ने अपने 'महाभाष्य' में लिखा है: "अरुणद् यवनः साकेतम्, अरुणद् यवनो माध्यमिकाम्।" (यवनों ने साकेत/अयोध्या और माध्यमिका/चित्तौड़ को घेर लिया है)। गार्गी संहिता के 'युग पुराण' में भी यवनों के मथुरा, पांचाल, साकेत और पाटलिपुत्र तक पहुँचने का वर्णन है।
अशोक के शासनकाल में वैदिक कर्मकांडों, पशु बलि और यज्ञों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। मौर्यों का राज्य धर्म बौद्ध बन गया था, जिससे ब्राह्मण वर्ग हाशिए पर चला गया था। पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता में आते ही वैदिक धर्म, संस्कृत भाषा और ब्राह्मणवादी परंपराओं का जोरदार पुनरुद्धार (Brahmanical Revival) किया।
दो अश्वमेध यज्ञों का आयोजन:
पुष्यमित्र ने अपने साम्राज्य की शक्ति और वैदिक धर्म की सत्ता स्थापित करने के लिए एक नहीं, बल्कि दो अश्वमेध यज्ञ (Ashvamedha Yajna) किए।
पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल का सबसे विवादास्पद पहलू बौद्धों के प्रति उनकी नीति है। बौद्ध साहित्य उन्हें एक क्रूर अत्याचारी और बौद्ध धर्म के विनाशक के रूप में प्रस्तुत करता है।
बौद्ध ग्रंथों जैसे 'दिव्यावदान', 'अशोकावदान' और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के लेखों में पुष्यमित्र को बौद्धों का हत्यारा बताया गया है।
रोमिला थापर और आर.एस. शर्मा जैसे आधुनिक इतिहासकार इन बौद्ध कथाओं को अत्यधिक 'अतिशयोक्तिपूर्ण' (Exaggerated) मानते हैं। इसके पीछे कई ठोस कारण और प्रमाण हैं:
निष्कर्षतः, पुष्यमित्र ने वैदिक धर्म को बढ़ावा जरूर दिया, लेकिन उन्होंने आम बौद्ध नागरिकों या धर्म का अंधाधुंध विनाश नहीं किया। उनका क्रोध केवल उन राजनीतिक बौद्धों पर था जो राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे थे।
पुष्यमित्र शुंग का काल भारत में कला, साहित्य और विशेषकर संस्कृत भाषा के पुनर्जागरण का स्वर्ण काल माना जाता है। मौर्य काल में प्राकृत और पाली भाषाओं का दबदबा था, लेकिन शुंग काल में संस्कृत फिर से राजभाषा और विद्वानों की भाषा बन गई।
पुष्यमित्र का साम्राज्य मौर्य साम्राज्य जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन यह बहुत सुदृढ़ और केंद्रित था।
पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 36 वर्षों (185 से 149 ईसा पूर्व) तक अत्यंत कुशलता से शासन किया। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने एक सुदृढ़ और सुरक्षित भारत अपने उत्तराधिकारियों को सौंपा।
प्रमुख उत्तराधिकारी:
शुंग वंश का अंत:
समय के साथ पुष्यमित्र के उत्तराधिकारी कमजोर और विलासी होते गए। शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति (Devabhuti) अत्यंत कामुक और अयोग्य था। लगभग 73 ईसा पूर्व में, देवभूति के ब्राह्मण मंत्री वासुदेव कण्व (Vasudeva Kanva) ने ठीक उसी प्रकार उसकी हत्या करवा दी, जैसे पुष्यमित्र ने बृहद्रथ की की थी। वासुदेव ने एक दासी की पुत्री को रानी का वेश पहनाकर देवभूति की हत्या करवाई और कण्व वंश (Kanva Dynasty) की स्थापना की। इस प्रकार 112 वर्षों तक चले शुंग वंश का अंत हो गया।
पुष्यमित्र शुंग का मूल्यांकन भारतीय इतिहास के सबसे जटिल कार्यों में से एक है। कुछ के लिए वे 'खलनायक' हैं, तो बहुतों के लिए वे 'राष्ट्र रक्षक'।
अंततः, सेनापति पुष्यमित्र शुंग भारतीय इतिहास के उस लौह पुरुष के रूप में जाने जाएंगे जिसने गिरते हुए मौर्य साम्राज्य के खंडहरों पर एक नए, सशक्त और सांस्कृतिक रूप से जीवंत भारत की इमारत खड़ी की। उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि जब राष्ट्र की सीमाएं और संस्कृति खतरे में हों, तो एक शिक्षक (ब्राह्मण) को भी अपनी शिखा खोलकर हाथ में खड्ग (तलवार) उठाने का पूर्ण अधिकार है।