राजा पोरस को आज भी भारत में देशभक्ति, बहादुरी और कभी न हार मानने वाले स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।
राजा पोरस (जिन्हें भारतीय इतिहास में महाराजा पुरूवास के नाम से जाना जाता है) प्राचीन भारत के एक महान योद्धा और शासक थे। उनका साम्राज्य पंजाब में झेलम (हाइडेस्पीज) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। पोरस को उनकी वीरता, विशाल कद-काठी और सिकंदर महान (Alexander the Great) को कड़ी टक्कर देने के लिए याद किया जाता है।
यहाँ उनके जीवन और सिकंदर के साथ हुए प्रसिद्ध युद्ध का विस्तृत विवरण है:
राजा पोरस पौरव वंश के राजा थे। उनका राज्य अत्यंत समृद्ध था और उनकी सेना अपनी युद्ध हाथियों (War Elephants) की टुकड़ी के लिए प्रसिद्ध थी। पोरस का व्यक्तित्व प्रभावशाली था; ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार उनकी लंबाई लगभग 7 फीट थी, जो उस समय के यूनानियों के लिए आश्चर्य का विषय थी।
326 ईसा पूर्व में, जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तो कई राजाओं (जैसे तक्षशिला के राजा आम्भी) ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन जब सिकंदर ने पोरस को आत्मसमर्पण का संदेश भेजा, तो पोरस का जवाब ऐतिहासिक था:
"मैं तुमसे मिलूँगा तो जरूर, लेकिन युद्ध के मैदान में।"
यह युद्ध इतिहास के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है।
युद्ध की रणनीति
झेलम का उफान: युद्ध मानसून के समय हुआ था। झेलम नदी उफान पर थी, जिसे पार करना सिकंदर के लिए असंभव लग रहा था।
सिकंदर की चाल: सिकंदर ने पोरस को भ्रमित करने के लिए अपनी सेना को नदी के किनारे घुमाना शुरू किया। एक तूफानी रात में, सिकंदर ने पोरस के शिविर से कई मील दूर जाकर गुप्त रूप से नदी पार कर ली।
पोरस का प्रतिरोध: जब पोरस को पता चला, तो उन्होंने पहले अपने पुत्र के नेतृत्व में एक छोटी सेना भेजी, लेकिन वे हार गए। इसके बाद पोरस स्वयं मुख्य सेना के साथ मैदान में उतरे।
रणभूमि का दृश्य
पोरस की सेना में 200 के करीब हाथी थे। इन हाथियों ने यूनानी घुड़सवारों के घोड़ों को डरा दिया। हाथियों ने यूनानी सैनिकों को कुचलना शुरू कर दिया। यूनानी इतिहासकारों ने लिखा है कि भारतीय सैनिकों के धनुष इतने बड़े थे कि उन्हें जमीन पर टिकाकर चलाना पड़ता था, लेकिन कीचड़ के कारण उन्हें चलाने में कठिनाई हो रही थी।
युद्ध का निर्णायक मोड़
सिकंदर की सेना ने हाथियों की आँखों और सूंड पर हमला करना शुरू किया, जिससे हाथी पागल होकर अपनी ही सेना को कुचलने लगे। पोरस अंत तक अपने हाथी पर डटे रहे, भले ही वे कई घावों से लहूलुहान हो चुके थे।
जब पोरस को बंदी बनाकर सिकंदर के सामने लाया गया, तो सिकंदर उनकी वीरता से बहुत प्रभावित था। सिकंदर ने पूछा:
सिकंदर: "तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?"
पोरस: "वैसा ही, जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।"
यह सुनकर सिकंदर इतना प्रभावित हुआ कि उसने न केवल पोरस का राज्य वापस लौटा दिया, बल्कि उसे कुछ नए इलाके भी दिए और पोरस को अपना सहयोगी बना लिया।
सिकंदर की सेना का मनोबल टूटना: पोरस के साथ हुए इस भीषण युद्ध ने सिकंदर की सेना के मन में डर पैदा कर दिया। उन्होंने आगे (मगध की ओर) बढ़ने से मना कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि आगे की सेनाएं (नंद वंश) और भी विशाल थीं।
राष्ट्रवाद का प्रतीक: राजा पोरस को आज भी एक ऐसे योद्धा के रूप में देखा जाता है जिसने विदेशी आक्रांता के सामने सिर नहीं झुकाया और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी।
राजा पोरस का अंत रहस्यमयी रहा; माना जाता है कि 321 और 315 ईसा पूर्व के बीच सिकंदर के ही एक सेनापति ने छल से उनकी हत्या करवा दी थी। लेकिन उनकी वीरता की गाथा आज भी भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।